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कोरोना महायुद्ध - अविश्वास की बढती काली छाया,कोरोना संकट से सबक ले समाज- मनोज कुमार द्विवेदी

अनूपपुर-19 अप्रैल 
  हर युग में रात 9 बजे दूरदर्शन पर जब रामानंद सागर की रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्र जी महाराज के  राज्याभिषेक का मनोहारी दृश्य देश के करोड़ो लोग भावविभोर हो कर देख रहे थे , तब ऐसे में पहला भाव जो मेरे मन में आया वह यह कि त्रेतायुग की तरह कलयुग में भी भगवान श्री राम के श्री चरणों में आस्था रखने वाले भक्त हैं तो उनसे विरक्त अभक्तों की संख्या भी कम नहीं है। लाकडाऊन की परिस्थितियों  के कारण बहुत से  लोगों को  घरों में सुरक्षित रहते हुए बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के पूर्ण आस्था के साथ भगवान श्री राम के राज्याभिषेक का आनंद लेने का सुअवसर मिला । जबकि एक बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसे यह मौका नहीं मिला या कुछ ऐसे लोग भी हैं , जो इसे नहीं देख रहे अथवा यह उन्हे सुहा नहीं रहा । 
त्रेतायुग में  राक्षसों के आतंक , भक्तों की साधना के बीच एवं  सीता हरण के होने के बाद तब का समाज , भगवान राम एवं राक्षस रावण के खेमें मे बंटा हुआ था। कुछ ऐसे लोग भी थे जो खुल कर दोनों में से किसी के साथ ना रह कर,  पर्दे के पीछे से अपनी - अपनी विचारधारा के योद्धाओं को बैकिंग देते हुए उनकी विजय की कामना के लिये अनुष्ठान करते रहे होगें। कहने का आशय यह जनता के बीच यह विभाजन तब भी था एवं आज भी बना हुआ है।
#कलयुगी वैश्विक आतंकवाद के दौर में  समाज में यदि सात्विक कर्म करने वाले लोग हैं, तो तामसी प्रवृत्ति के लोग भी हैं। समाज में भक्त हैं ....तो उनके विरोधी भी है। धर्म, संस्कृति,देश हित के लिये कार्य करने वाले लोग हैं...तो इसे आडंबर मान कर भक्तों के अनुष्ठानों का मजाक बनाने वाले.उसमें खलल  डालने वाले लोग भी हैं। भगवान श्री राम की जय कहने वाले लोग हैं. तो जय श्री राम से परहेज करने वाले तथा श्रीराम  एवं रामसेतु को काल्पनिक मानने वाले लोग भी हैं । आतताई तब भी थे , वे आज भी हैं । एक बड़ा अन्तर तब व आज के समाज का यह है कि कट्टरपंथ , अंधविश्वास, जाति- पंथ भेद तब नहीं था। यह आज दुनिया की तमाम समस्याओं की जड़ है।
 त्रेतायुग में श्रीराम के भक्तों , उनके अनुयायियों में शुभ कर्मों के फलस्वरूप किसी ना किसी रुप में हम - आप जैसे लोग तब भी उसके अभिन्न अंग रहे होंगे। यही कारण है कि आज उनकी कृपा से कोरोना संकटकाल में बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के, देश के काम आने का सौभाग्य बहुत से लोगों को मिला हुआ है। जबकि तब के रावण सेना में शामिल उनकी विचारधारा के लोग भी हर युग में हुए हैं।
कोरोना का लाकडाऊन समय कार्य, समर्पण, विचारधारा के हिसाब से समाज को चार प्रकारों में  विभाजित करता है।
प्रथम वर्ग में विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका ,मीडिया एवं समाजसेवकों के रुप में अपनी क्षमता, सामर्थ्य, शक्ति का पूरा उपयोग करके सच्चे मन से जीवन रक्षा, गरीब - असहायों के सहयोग में प्रत्यक्ष / अप्रत्यक्ष कार्य कर रहे ऐसे लोग हैं, जो किसी ना किसी रुप में लोगों की जिन्दगियां बचाने की जद्दो जहद से सीधे या अप्रत्यक्ष रुप से जूझ रहे हैं।
द्वितीय वर्ग में उन्हे शामिल किया जा सकता है जो स्वयं इस आपदा से प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष प्रभावित ,पीडित हुए हैं। चाहे वे कोविड-  19 से संक्रमित होने वाले लोग हों , उनके परिजन हों या  क्वेरेन्टाइन किये गये लोग हों अथवा लाकडाऊन से प्रभावित होकर दर - बदर भटकने वाले लाखों लोग हों । परिवार से दूर होने   वाले या काम धन्धा बन्द हो जाने से आभाव का जीवन जीने को बाध्य हो जाने वाले या मजबूरन लोगों से सहायता/ सहानुभूति के पात्र शामिल लोग हैं।
#तीसरा ऐसा वर्ग है जो महाबीमारी को बढता देख, लोगों को दम तोडता देख या परेशान होता देख मनोरोगी की तरह मानसिक सुख का अनुभव करके इसे एक अवसर की तरह ले रहा है। इसमे जानते बूझते संक्रमण को फैलाने वाले जमाती ,  चिकित्सक+ उनके दल+ आशा कार्यकर्ताओं + सुरक्षा बलों पर हमले करने वाले लोग शामिल हैं । वस्तुओं - सेवाओं की कालाबाजारी करने वाले मुनाफाखोर अपराधियों को इसमें रखा जा सकता है।
चॊथा तबका ऐसे लोगों का है जो दिखावे के लिये तो सिस्टम / देश के साथ दिखना चाहता है लेकिन वास्तव में वह किसी भी रुप मे कोरोना फायटर्स के साथ नहीं है। ना संसाधनों से वह साथ देना चाहता है ... ना ही वैचारिक रुप से वह कोरोना युद्ध में सरकार के या समाज के साथ है। यह एक ऐसा वर्ग है जो स्पष्ट खिंची लाईन के दूसरी ओर स्पष्ट खडा होकर सवाल करके या सवालिया निशान लगाते हुए समाज में भ्रम, भय की स्थिति बनाए रखना चाहता है।
     कोरोना महायुद्ध त्रेतायुग , द्वापर युग या कलयुग के किसी भी काल में हुए महायुद्ध की तरह आज या कल समाप्त हो जाएगा। यह एक वैश्विक महायुद्ध है, जिसे निस्पृह रह कर  या तटस्थ हो कर आप नहीं लड सकते। सिर्फ सवाल पूछने ,सिर्फ सुझाव देने, भ्रम फैलाने या सिर्फ चुटकियां लेने से युद्ध जीते जाते तो भगवान श्री राम की सेना में या रावण की राक्षसी सेना में  इसका अलग विंग ही होता। यह महायुद्ध करोड़ो जिन्दगियों तथा विश्व की अर्थ व्यवस्था से जुडा हुआ है। गलती / लापरवाही/ साजिश के कारण कोरोना  संक्रमण फैलाकर लाखों जिन्दगियों को नष्ट करने वाले या उनकी विचारधारा के साथ खडे होकर चिकित्सकों, पुलिस पर हमला करने वाले लोग नये तरह के जैविक आतंक के महज मोहरे हैं। इन्हे समर्थन देना,इनसे सहानुभूति रखना साजिश का हिस्सेदार बना सकता है।
कलयुग के कोरोना काण्ड में सभी पात्रों की भूमिका तय है। रामायण काल में जो लोग  महाभारत काल में भी वही लोग थे। आज जब कोरोना महायुद्ध हो रहा है,  तो भी वे सभी लोग हैं। तब व आज में समय ,काल , युग बदला है। धर्म - अधर्म , नीति - अनीति , शासन - कुशासन, आतंकवाद तब भी था , आज भी है। मानवता के दुश्मन  आतंकवादी तब भी थे आज भी हैं। बस स्वरुप बदल गया है चेहरे बदल गये हैं....भाषा बदल गयी है पहनावा बदल गया है।
लेकिन पृथ्वी , प्रकृति, ग्रह, नक्षत्रों के साथ मानव एवं राक्षसी प्रवृत्ति जस की तस है । अतिरेक होने पर , धर्म की हानि होने पर , धरती पर अनाचार बढने पर सबकुछ धर्मानुकूल होकर  संतुलित हो जाता है।
मानव जीवन के लिये बड़ा संकट है आपसी विश्वास खत्म होने का खतरा है। जो हमारे सामाजिक ताने बाने को छिन्न भिन्न कर रहा है। यह संकट मनुष्यों के अतिरिक्त किसी के लिये नहीं है। घर के बाहर रखे नांद मे गाय, बैल, बकरियां , कुत्ते , पक्षी साथ आकर पानी पी रहे हैं। जंगल में भी जानवरों के बीच थूकने , छींकने, संक्रमित करने , नीचा दिखाने ,कोरोना फैलाने का संकट नहीं है। अन्य जीव - जन्तुओं के लिये कठिन समय होने पर भी वे सुरक्षित हैं। पर्यावरण व प्रकृति बहुत बेहतर हुए हैं। यह संकेत है हमारे लिये ...हम सबके लिये समय रहते चेत जाने का। अन्यथा  प्रकृति अपने अनुरुप निर्णय कर ही लेगी।

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