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अथ गोबर पुराण ....स्वावलंबन की दिशा में एक कदम

( मनोज द्विवेदी, अनूपपुर, म प्र )
अनूपपुर-6 जुलाई 2020

जब दुनिया में अन्य किसी तरह की संस्कृति, सभ्यता का कोई ओर - छोर तक नहीं था, भारतीय सभ्यता ने प्रकृति एवं उससे जुड़े सभी अवयवों का महत्व समझ कर उसे पूज्यनीय बतला कर संरक्षित करने का जतन कर लिया था। गोबर उनमें से एक है।
    अभी एक खबर सोशल मीडिया में वायरल हुई कि छत्तीसगढ़ सरकार डेढ रुपये किलो गोबर खरीदेगी। यदि इस सूचना मे तनिक भी सच्चाई है तो  यह छोटी लेकिन महत्वपूर्ण घटना है।
गोबर भारतीय सनातन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिन्दू परिवार हजारों साल से गोबर का धार्मिक, आध्यात्मिक, आर्थिक महत्व समझते रहे हैं। भगवान सत्यनारायण की कथा से लेकर जन्म, उपनयन, विवाह सहित सभी शुभ कार्यों तथा मृत्यु से जुडे कर्मकाण्ड बिना गोबर के नहीं होते। सुघड गृहणियां आज भी तुलसी के घरुवा तथा आंगन का एक हिस्सा गोबर से जरुर लीपती हैं। बहुत से ग्रामीण आज भी घर के दीवारों को बनाते समय मिट्टी में गोबर, भूसी जरुर मिलाते हैं । यह दीवार को अतिरिक्त मजबूती प्रदान करते हैं। गोबर ईंधन का अच्छा स्रोत है....धर्म से जुड़े लोग गाय के गोबर के कंडे को जला कर शुद्ध घी से हवन भी करते हैं। प्रसूता के कमरे मे कंडा जलाकर अजवाइन का धुंआ करने, उसकी आंच में गर्म तेल की मालिश का रिवाज आज भी जानकार परिवारों में है। किसान बन्धुओं के लिये जैविक खेती की कल्पना बिना गोबर पूरी हो ही नहीं सकती।
कहने का आशय ये कि यदि यह जिनके दिमाग में भरा हो, उन्हे छोडकर सभी के लिये बहुउपयोगी.. अत्यंत महत्वपूर्ण ...इसलिये पूज्य है।
भारत के कुछ हिस्सों में पशु पालकों की स्वार्थपरता तथा कुछ मामलों में मजबूरी के चलते लोग गाय को दुहने , बैलों का उपयोग कर उन्हे घर पर या खनिहाल में बांध कर रखने की जगह सडकों में खुला छोड देने की आपराधिक  कुप्रथा सामने आ रही है। आवारा घूमते पशुओं के चलते ऐरा प्रथा को बढावा मिला है। इससे फसलों को बडा नुकसान होता है। सडकों पर आए दिन दुर्घटनाएं होने से जानें जा रही हैं, लोग विकलांग हो रहे हैं , परिवार तबाह हो रहे हैं। पशुओं को सडकों पर खुला छोड़ देना अत्यंत प्राणघातक तथा आपराधिक मामला है। अनूपपुर जिले की रामनगर पुलिस ने ऐसे ही मामले में पशुमालिकों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किया था। हाइवे तथा सडकों पर जानवरों के झुण्ड बैठे रहते हैं । जिसके कारण स्वयं इनकी जान भी खतरे में रहती है। सडकों पर इनके फैलाए गोबर से फिसल कर बहुत से दो पहिया वाहन चालक गिर कर हाथ पैर तुडवा लेते हैं। इनके आपसी द्वंद , झगडे का शिकार भी आम जनता होती रहती है।
  प्रशासन ने ऐरा प्रथा के विरुद्ध कई अभियान चलाए हैं, लेकिन कडी कार्यवाही के आभाव में पशुमालिकों के आचरण में सुधार नहीं है।
 ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा गोबर की जलेबी का लालच शायद काम कर जाए। गोबर लाभदायक है। शहरी- ग्रामीण क्षेत्रों में लोग आज भी 2-10 रुपये में गोबर का एक कंडा बेंचते हैं। म प्र के शहडोल के तत्कालीन कमिश्नर जे के जैन ने नर्मदा उद्गम मन्दिर अमरकंटक में गोबर के बने गमले मे पौधा रोप कर प्रसाद रुप में श्रद्धालुओं को देने की योजना चलाई थी। शहडोल में ही सद्गुरु मिशन के धेनु सेवा संस्थान द्वारा गायों के संरक्षण का महत्वपूर्ण कार्य करते हुए गोबर की सिल्लियां बना कर ईंधन के लिये सुलभ कराया गया है। जैविक खाद के लिये गोबर खरीदा - बेंचा जाता है।
   छत्तीसगढ़ सरकार ने गोबर खरीदने की योजना शुरु की है। यह सराहनीय एवं अन्य राज्यों के लिये अनुकरणीय है। गोबर की कीमत मिलने पर लोग पशुओं को घर पर रख कर उन्हे चारा- पानी देकर पालन करेंगे तो ना केवल वे स्वावलंबन की ओर आगे बढेंगे अपितु ऐरा प्रथा पर रोक भी लगेगी। गोबर से बनी सिल्लियां चूल्हे में जलाई जा सकती हैं। यह ईंधन का अच्छा स्रोत है। जिन्हे चूल्हे में पका भोजन पसंद है, उनके लिये लकड़ी पर निर्भरता खत्म हो जाएगी।
       गोबर यदि दिमाग में हो तो ये नुकसानदायक भी होता है। इसके कारण अच्छे- बुरे की समझ समाप्त हो जाती है। ऐसा व्यक्ति शत्रु - मित्र में भेद नहीं कर पाता। नेतृत्व क्षमता, कार्यकुशलता में कमी होती है। बेवजह उचित - अनुचित सवाल पूछना अपना अधिकार समझने लगता है। ऊट पटांग सवाल पूछ कर अपना, समाज का , देश का नुकसान करता रहता है। स्वयं का मजाक बनवा कर भी वह जरा भी नहीं चेतता। इसीलिये भारतीय समाज में इनकी अपनी जगह , पहचान होते हुए भी उसे स्थापित नहीं रख पाते। सनातन धर्म में इसीलिये गाय का गोबर बहुत उपयोगी माना गया है। आने वाले समय में यदि यह ऒर मंहगा बिके तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए ।

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