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क्यों रह - रह कर याद आते हैं बचपन के दोस्त,स्कूली मित्रों की मित्रता होती है निर्दोष

( मनोज द्विवेदी - अनूपपुर , मप्र ) 5 सितंबर 2020

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जनकपुर ( आज का छत्तीसगढ़ ) में मेरा एक मित्र है धर्मेन्द्र वर्मा । उसकी छ: फुट की हष्ट- पुष्ट काया के अन्दर छुपे बाल सुलभ बचपन के हम सब आज भी दीवाने हैं। कल उसने व्हाट्स एप पर प्रधानमंत्री मोदी के लिये एक चुटीला कार्टून शेयर किया। फिर उसे आज ये ध्यान आया कि मनोज तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक है। प्रधानमंत्री मोदी पर व्यंग्य कहीं बुरा तो नहीं लग गया। तब उसने आज मुझे लिखा ( लिखा क्या ! मरहम लगाने की कोशिश की ) कि यार ! मैं भी मोदी जी का फैन हूँ । देश की मजबूती और विकास के लिये मोदी जी बहुत जरुरी हैं।

  विषय बहुत मामूली है, ऐसा दोस्तों के बीच आमतौर पर होता रहता है। लेकिन इसके पीछे एक मनोविज्ञान छिपा है। सच कहूं तो धर्मेन्द्र के कार्टून ने मुझे जरा भी विचलित नहीं किया। उसके पीछे का कारण शायद यही है कि वो मेरा बचपन का ( शायद  कक्षा ४-५ का ) अभिन्न मित्र है। उसकी या ऐसा कहें कि सभी के स्कूली मित्रों की सहजता, सरलता उम्र बीतने के साथ - साथ और भी मधुर लगने लगती है‌। बचपन में लडकी - लडके के भेद से परे आपस में दोस्ती का जो धागा हमें आपस में जोड़ता है, वह जवानी , अधेड़ावस्था के आगे जाते- जाते, बढापे तक भी बहुत मजबूत , नि: स्वार्थ रहता है। उम्र बढने के बावजूद बचपन की मित्रता की मिठास कम नहीं होती। इस मिठास के चाहे जितने भी बढने से डायबिटीज का खतरा भी नहीं रहता। 

    मेरा अपना अनुभव यह है कि महाविद्यालयीन अध्ययन तक , या उसके बाद के दो- तीन साल तक युवक दुनियादार नहीं होता। वह निष्कपट, निष्कलंक, निर्दोष सच्चाई, ईमानदारी, सिद्धांतवाद की प्रतिमूर्ति होता है। इसलिये युवाओं को दुनियादार लोग अपनी कुटिलता के वायरस से संक्रमित कर अपने जैसा बना देते हैं। 

     किशोरावस्था में जिसके जितने अधिक मित्र रहते हैं...उसके बाद ५० वर्ष के उम्र के पडाव में पहुंचते -  पहुंचते यदि इनमें से कुछ बचपन के मित्र आपस में संपर्क में रहते हैं, तो यह मानें कि अपने सम उम्र लोगों से ऐसे लोग अधिक खुश, अधिक स्वस्थ ,अधिक खुशहाल रहते हैं। किशोरावस्था का आपसी स्नेह ( जिसे सहज आकर्षण का नाम दिया जाता है) सिर्फ कल्पनाओं की उपज कह कर खारिज नहीं किया जा सकता। नि:स्वार्थ, निष्कपट स्नेह में देवत्व के दर्शन भी किये जा सकते हैं। 

   सोशल मीडिया आज उम्र के इस पड़ाव के सम उम्र लोगों के लिये वरदान बन कर सामने आया है। चिट्ठी - पत्री के दौर के लोगों के लिये यह एक ऐसा मंच है,जिसमें उनके पुराने मित्रों की सहज सुलभता है। सालों पुराने मित्रों के परिवर्तित स्थूल शरीर, झुर्रीदार चेहरों, झडे- पके- डाई किये बालों वाले चेहरों में उन्हे अपना बचपन तलाशने में कोई दिक्कत नहीं होती। वो व्हाट्स एप, फेसबुक में अपने बचपन के यारों को देख कर, पहचान कर, उनसे जुड कर बच्चों जैसी प्रसन्नता हासिल कर रहा है। बहुत सी कही - अनकही बातें, उसके पीछे का स्नेह, उसकी यादों को कौन फिर महसूस नहीं करना चाहेगा । 

बचपन आपको नया जीवन देता है। वो चाहे आपके बच्चों, नाती - पोतों में हो या स्वयं के अतीत की यादों में । रोज के बीतते तनाव, प्रतियोगिता भरे , छल - कपट वाले जीवन में बचपन की यादें, बचपन के मित्र,उनसे होने वाली बातें लोगों को नया जीवन दे रही हैं। इसलिये जब धर्मेन्द्र ने लिखा कि यार बुरा नहीं मानना....तो उसकी यह परवाह देख कर मन एक बार फिर बचपन के अपने मित्रों में हमेशा के लिये खो जाने को करता है। मुझे लगता है कि जिसके पास बचपन का यह खजाना है....उससे बड़ा...उससे बड़ा धनवान...उससे बड़ा भाग्यवान कौन होगा ? 

मैं तो हूँ.....& आप ???

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